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Essay On Bhartiya Samaj Aur Nari In Hindi

भारतीय समाज में नारी का स्थान (Bhartiya samaj mein nari ka sthan)

प्राचीन काल में हमारे समाज में नारी का महत्व नर से कहीं बढ़कर होता था। किसी समय तो नारी का स्थान नर से इतना बढ़ गया था कि पिता के नाम के स्थान पर माता का ही नाम प्रधान होकर परिचय का सूत्र बन गया था। धर्म द्रष्टा मनु ने नारी को श्रद्धामयी और पूजनीया मानते हुए महत्व प्रदर्शित किया-

‘यत्रनार्यस्तु पूज्यते, रभन्ते तत्र देवताः।’

अर्थात् जहाँ नारी की पूजा प्रतिष्ठा होती है, वहाँ देवता रमण करते हैं, अर्थात् निवास करते हैं।

धीरे धीरे समय के पटाक्षेप के कारण नारी की दशा में कुछ अपूर्व परिवर्तन हुए। वह अब नर से महत्वपूर्ण न होकर उसके समकक्ष श्रेणी में आ गई। अगर पुरूष ने परिवार के भरण पोषण का उत्तरदायित्व सम्भाल लिया तो घर के अन्दर के सभी कार्यों का बोझ नारी ने उठाना शुरू कर दिया। इस प्रकार नर और नारी के कार्यों में काफी अन्तर आ गया। ऐसा होने पर भी प्राचीन काल की नारी ने हीन भावना का परित्याग कर स्वतंत्र और आत्मविश्वास होकर अपने व्यक्तित्व का सुन्दर और आकर्षक निर्माण किया। पंडित मिश्रा की पत्नी द्वारा शंकराचार्य जी के परास्त होने के साथ गार्गी, मैत्रेयी, विद्योत्तमा आदि विदुषियों का नाम इसी श्रेणी में उल्लेखनीय है।

समय के बदलाव के साथ नारी दशा में अब बहुत परिवर्तन आ गया है। यों तो नारी को प्राचीनकाल से अब तक भार्या के रूप में रही है। इसके लिए उसे गृहस्थी के मुख्य कार्यों में विवश किया गया, जैसे- भोजन बनाना, बाल बच्चों की देखभाल करना, पति की सेवा करना। पति की हर भूख को शान्त करने के लिए विवश होती हुई अमानवता का शिकार बनकर क्रय विक्रय की वस्तु भी बन जाना भी अब नारी जीवन का एक विशेष अंग बन गया।

शिक्षा के प्रचार प्रसार के फलस्वरूप अब नारी की वह दुर्दशा नहीं है, जो कुछ अंधविश्वासों, रूढि़वादी विचारधारा या अज्ञानता के फलस्वरूप हो गयी थीं। नारी को नर के समानान्तर लाने के लिए समाज चिन्तकों ने इस दिशा में सोचना और कार्य करना आरंभ कर दिया है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने इस विषय में स्पष्टता ही कहा है-

‘एक नहीं, दो दो मात्राएँ, नर से बढ़कर नारी।’

नारी के प्रति अब श्रद्धा और विश्वास की पूरी भावना व्यक्त की जाने लगी है। कविवर जयशंकर प्रसाद ने अपनी महाकाव्यकृति कामायनी में लिखा है-

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो,

विश्वास रजन नग, पग तल में।

पीयूष स्रोत सी बहा करो,

जीवन के सुन्दर समतल में।।

अब नारी की स्थिति वह नहीं रह गयी है-

‘नर को बाँटे क्या, नारी की नग्न मूर्ति ही आई।’

नारी आज समाज में प्रतिष्ठित और सम्मानित हो रही है। वह अब घर की लक्ष्मी ही नहीं रह गयी है अपितु घर से बाहर समाज का दायित्व निर्वाह करने के लिए आगे बढ़ आयी है। वह घर की चार दीवारी से अपने कदम को बढ़ाती हुई समाज की विकलांग दशा को सुधारने के लिए कार्यरत हो रही है। इसके लिए वह नर के समानान्तर पद, अधिकार को प्राप्त करती हुई नर को चुनौती दे रही है। वह नर को यह अनुभव कराने के साथ साथ उसमें चेतना भर रही है। नारी में किसी प्रकार की शक्ति और क्षमता की कमी नहीं है। केवल अवसर मिलने की देर होती है। इस प्रकार नारी का स्थान हमारे समाज में आज अधिक सायादूत और प्रतिष्ठित है।

(500 शब्द words)

नारी का सम्मान

Nari ka samman Hindi Article

नारी का सम्मान Nari ka samman Hindi Article

 

हमारे देश में आज भी नारियों को वो सम्मान नहीं मिला है, जिसकी वो हक़दार हैं। आज भी बहुत सारी स्त्रियाँ ऐसी हैं। जिनकी कोई मर्ज़ी नहीं होती और उन्हें हर काम दूसरों के हिसाब से करना पड़ता है। और इसे नाम दिया जाता है भारतीय संस्कृति का।

क्या भारतीय संस्कृति में ये लिखा है, कि एक औरत को उसकी मर्ज़ी से जीने का कोई हक़ नहीं है, कई घरों में आज भी स्त्रियों का कोई सम्मान नहीं है, शायद यही कारण है कि आज भी हमारा देश उन्नति नहीं कर पा रहा है।

Government ने तो काफ़ी सारे कानून बनाये हैं, और काफी सारे समानताओं के अधिकार दिए हैं। लेकिन जब तक मानसिक तौर पर लोग नारी को वो सम्मान, वो अहमियत नहीं देंगे। हमारे देश का विकास कैसे संभव होगा।

आखिर नारी इतनी मजबूर क्यों है?  खुद सारी दुनियाँ की जननी होकर वह अपनी पहचान से इतनी दूर क्यों है ?  यूँ तो लोग नारी पर बड़ी-बड़ी बातें कहते हैं, पर क्या वाकई में किसी ने नारी को वो सम्मान दिया है जिसकी वह हक़दार है।

शादी से पहले तो माता पिता अपनी बेटी को बड़े लाड़-प्यार से पालते हैं और बड़े धूमधाम से उन्हें विदा करते हैं, पर क्या शादी के बाद भी वो उतनी ही स्वतन्त्र रह पाती है, उसके विचारों को उतनी ही स्वतंत्रता दी जाती है। उसका सम्मान उतना ही होता है जितना माता पिता के घर में था।

क्यूँ सारे परिवार को अपना बनाने के बाद उसके सारे हक़ खो जाते हैं। क्यूँ सारे परिवार का ख्याल रखने के बाद उसके जज्बातों को समझने वाला कोई नहीं होता। क्यूँ शादी के सालों बाद ही उसे अपनी माँ के घर में अपनापन महसूस होता है।

क्यूँ सारे कर्तव्य स्त्री को ही समझाए जाते हैं क्यूँ सारे नियम स्त्रियों के लिए ही बनाए जाते हैं. क्यूँ उनके लिए गल्तियों की कोई गुंजाईश नहीं है।

क्या पुरुषों का फ़र्ज़ सिर्फ पैसे कमाना है। किसी की बेटी को अपने घर की बहु बनाने के बाद उसकी भावनाओं का ख्याल रखने की ज़िम्मेदारी किसकी होती है। उसकी अच्छाइयों के साथ उसकी कमियों को अपनाने की जिम्मेदारी किसकी है।

वो आपके घर में आकर आपकी अच्छाइयों और कमियों दोनों को Accept करती है, तो क्यूँ नहीं उसकी कमियों को Accept किया जाता है. क्या आपका फ़र्ज़ नहीं कि उसकी Capacity को समझें। क्यूँ उसके ऊपर उसकी capacity से ज्यादा जिम्मेदारियां डाल दीं जाती हैं।

क्यूँ किसी और की बेटी को अपनी बेटी की तरह नहीं समझ सकते। उसके दर्द में क्यूँ आपको तकलीफ नहीं होती। वो जिस माहौल से आई है, उसके विपरीत माहौल में रहना, रहन सहन, खाना पीना सब कुछ बदल जाता है। उसके लिए ये सब कितना मुश्किल होता होगा। इस बारे में कोई क्यूँ नहीं सोचता।

सबको अपने Expectation की फ़िक्र होती है जो कभी पूरे नहीं हो सकते। और जब वो सारी जिम्मेदारियों को पूरा करने में खुद को सक्षम नहीं पाती, सबकी नज़रों वो प्यार और इज्जत नहीं पाती। तब उसके अन्दर एक वगावत पैदा हो जाती है.और वह अपनी बातें रखना शुरू करती है, जो कि हर घर में लड़ाई झगड़े की वजह बनती है. वो चाह कर भी किसी को अपना नहीं बना पाती और जब उसकी चुप्पी टूटती है तब जो शोर होता है, वह घर में कलह का रूप धारण कर लेता है। जिससे बच्चों पर भी गलत असर होता हैं। और इसका जिम्मेदार भी सारा समाज उसे ही ठहराता है।

बहुत कम ही ऐसी स्त्रियाँ होती है, जो सारी जिन्दगी दूसरों के हिसाब से चले। इसलिए ज्यादात्तर घरों में सामंजस्य देखने को नहीं मिलता। सबकुछ होते हुए अन्दर ही अन्दर परिवार में एक तनाव रहता है।

ये स्थिति सबसे ज्यादा गाँव में और ऐसे घरों में है जहाँ लोग कम पढ़े-लिखे है। देखा जाये तो स्त्री ही स्त्री की दुश्मन है, स्त्री ही स्त्री को सारे नियम कानून मानने के लिये बाध्य करती है। ऐसे में हमारा देश तो पुरुषप्रधान होगा ही, जब महिलाएं खुद स्वीकार कर लेंगी कि उनकी यही जिन्दगी है, सदियों से यही चला आ रहा है। पुरुष सब कुछ हैं और स्त्री कुछ भी नहीं।

जब किसी घर में एक बहू आती है, तो वह गलत होती है। लेकिन जब उसी घर की बेटी ससुराल जाती है, तो उसके ससुराल वाले गलत होते हैं। ये Cycle चलता रहता है। गौर से देखें तो हर घर की बहू गलत है और बेटी सही है। ऐसे में नुकसान सिर्फ महिलाओं का है। हर जगह वही गलत सिद्ध हो रहीं है।

एक स्त्री को चाहिए की वह दूसरी स्त्री की मदद करे। एक बहू को चहिये कि वो सबके साथ मिलकर प्रेम से रहे। ससुराल को अपना घर समझकर अपनी जिम्मेदारी को समझे और पूरा करे। घर की हर महिला को उसकी मदद करनी चाहिए।

जब तक एक स्त्री खुद अपनी क़द्र करना नहीं सीखेगी, तब तक उसे कभी न्याय नहीं मिलेगा। किसी भी बेटी को ससुराल में माँ का प्यार नहीं मिलेगा। जिस दिन  एक बहु को एक बेटी की तरह प्यार मिलेगा, उसकी गलतियों को अपनी बेटी की तरह माफ़ किया जायेगा, उसे अपनी बेटी की तरह सिखाया जायेगा, सुधारा जायेगा। उस दिन हर घर की बेटी अपने ससुराल में खुश रहेगी।

अगर नारी ही नारी का सम्मान  करने लगे तो, इस पुरुष प्रधान देश में नारियों को सम्मान मिलना संभव होगा

 

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Filed Under: Hindi Article, womanTagged With: Hindi article for woman, respect woman in Hindi, woman empowerment, नारी का सम्मान, भारतीय समाज में नारी का सम्मान, महिला दिवस